(पार्ट वन- कॉलेज सिनेरियो)
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं भुक्तभोगी हूं। मीडिया में जब तक था ऑफिस में इंट्री करते ही सीने में एक अजीब की जकड़न महसूस होती थी। लगता था मेरा सीना बैठा जा रहा है, और कुछ देर इस तनावपूर्ण माहौल में रहा तो प्राण त्याग दूंगा। तीन मीडिया हाउसेस के साथ काम करने के दौरान हर ऑफिस का यही शोषण भरा माहौल रहा।
शुरू से बात करते हैं, पत्रकारिता के नाम पर बच्चों को जिस हद तक बेवकूफ बनाया जा रहा है उसकी कोई सीमा नहीं है। रजत शर्मा, अंजना ओम कश्यप बनाने के सपने दिखाने वाले मीडिया कॉलेजेज 10 हजार की नौकरी दिलाने में भी हांफ जाते हैं, ये सच्चाई है। लेकिन ये आपको एडमिशन की मोटी फीस लेते वक्त नहीं बताया जाता। उस वक्त आपको ट्रैप किया जाता है, एंकर्स, रिपोर्टर्स की फोटो और चैनल की चकाचौंध दिखाकर। यकीन मानिए 70 प्रतिशत बच्चे इस क्षेत्र में आते हैं एंकर्स बनने या फिर ग्लैमर का सपना लेकर बाकी 25 प्रतिशत ऐसे जो कुछ नहीं कर पाए तो पत्रकारिता कर लिया। मात्र 5 प्रतिशत ही ऐसे होंगे जिन्हें कोर्स के बाद मिलने वाली नौकरी, सैलरी और बाद के निम्न सामाजिक और आर्थिक स्तर का अंदाजा रहता हो। वे जानते हैं कि पत्रकारिता उनका पैशन है जिसकी राह में उनकी छोटी सैलरी और बड़ा दबाव रोड़ा नहीं बनेगा। वो अलग बात है कि किसी संस्थान विशेष से जुड़ने के बाद उनका पैशन धरा रह जाता है और वह सिर्फ ट्रांसलेशन और कॉपी पेस्ट तक ही सीमित रह जाता है।
साल 2014 में मैंने भी एडमिशन यही सोचकर लिया था। पहला- खबरों व लेखन में कुछ रुचि थी, दूसरा- पत्रकारिता करके थोड़ा रुतबा रहेगा ये सोचकर ( जो कि सिर्फ भ्रम है)। एमबीए के लिए एचबीटीआइ और भी अच्छे कॉलेजेज के ऑप्शन खुले होने के बावजूद ना जाने क्या सोचकर पत्रकारिता की ओर कदम बढ़ा दिए। खैर, नोएडा के एक कॉलेज में एडमिशन लिया वहां पहले से कुछ सीनियर्स तैनात थे ये बताने के लिए कि कॉलेज अच्छा है, भले वह 4 कमरों का है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर मत जाओ एडमिशन ले लो। वो क्यों, क्योकि उन सीनियर्स को यह कह कर तैयार (डराया) किया जाता था कि अगर नए बच्चों ने एडमिशन नहीं लिया तो कॉलेज चलाने के लिए फंड नहीं रहेगा परिणामस्वरूप यह बंद हो जाएगा और सीनियर्स की पढ़ाई बीच में अटक जाएगी। खैर, एडमिशन हो गया सोचा था निकलते ही एंकर नहीं तो न्यूज चैनल में रिपोर्टर तो बन ही जाएंगे।
एक साल बीतते ही समझ आ चुका था कि यहां से निकलने के बाद अगर नौकरी ही मिल जाए तो बड़ी बात है। ऐसा इसलिए कि पत्रकारिता ऐसा कोर्स है जिसका नौकरी दिलाने में या नौकरी के दौरान प्रयोग होने वाली स्किल्स से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। सिलेबस शायद ही 20 प्रतिशत ही प्रासंगिक हो। इसमें मेन बात- माडिया हाउसेज का टेस्ट कैसे क्लीयर करते हैं वो हीं नहीं बताया गया। इससे अच्छा तो राजनीति विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, ग्रामीण विकास, मनोविज्ञान आदि से बी.एम या ए.ए. करना है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो अधिकतर बड़े पत्रकार मीडिया का कोर्स तो बिल्कुल नहीं करके आए हैं। खैर, जैसे-तैसे कोर्स पूरा हुआ। मैं जानता था कोर्स मैंने अपनी मर्जी से किया है अगर नौकरी नहीं लगी तो बड़ी फजीहत होगी इसलिए मैंने सीनियर्स से पहले ही यह जान लिया था कि टेस्ट में क्या पूछा जाता है।
खबरें, ट्रांसलेशन और फ्रूफ रीडिंग मजबूत करके कौशांबी स्थित “एक कमरे की एक कंपनी” में गया, इंटरव्यू देने। सबकुछ क्लीयर होने के बाद चश्मा नीचे करते हुए वहां बैठे एक सो कॉल्ड एडिटर ने मुझसे पहले ही कह दिया कि 6 हजार दे पाएंगे इतना ही बजट है, सुनते ही मैं सकपका गया। खैर, पूछा काम क्या करना होगा तो बोला कि कॉपी पेस्ट और ट्रांसलेशन। आत्मा ने गवाही नहीं दी, मना करके आ गया हालांकि वहां बैठे एडिटर और मैनेजमेंट के बीच की कड़ी (एक बेहद धूर्त और नकारात्मकता से भरा व्यक्ति) ने बुला कर दुनियाभर की निगेटिविटी फैलाकर डराने की और यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि इसके अलावा दुनिया में नौकरी नहीं है, चुपचाप ज्वाइन कर लूं। मन नहीं माना निकल आया वहां से। उस साल मेरे कॉलेज में एक मात्र अखबार आया था जिसका ऑफिस नोएडा में कॉलेज के पास ही था। उसकी प्रवेश परीक्षा में बैठा तो सफल हो गया। लेकिन ऑफर लेटर देखकर सन्न रह गया जिसमें सैलरी मात्र 10 हजार लिखी हुई थी। ईएसआई काट कर और भी कम। मरता क्या न करता, करनी पड़ी नौकरी साल भर करने के बाद दूसरी कंपनी के तौर पर एक सो कॉल्ड ‘न्यूज पोर्टल’ ज्वाइन किया जिसकी कहानी बड़ी भयावह और कलेजा कंपा देने वाली है जो अगले पार्ट में आपको पढ़ने को मिलेगी….. (प्रशांत श्रीवास्तव)






