” जब घबरा जाता था , कठिन शब्दों की इमला से
आँखों से बहने लगते थे आंसू , तब कोई था जो हौसला बढ़ाता था लिखना सिखाता था ..!
वो कोई था , वो अब भी है , मेरे दिल ले भीतर , बीते दिनों की यादों के साथ ,
इस सफ़र में कभी नहीं भूला हूँ , कभी नहीं भूलूंगा ,अपने गुरु को ….! “
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, प्रारम्भ में ही ज्ञान शिक्षा का आश्रम स्थापित करने के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है।
” पान की दुकान पर अक्सर दिखते हैं साथ , टीचर – स्टूडेंट्स सिगरेट कश लगाते हुए,
एक को लालच है , अंकपत्र में बढ़े हुए प्राप्तांकों का , एक को लालच है मुफ्त की इच्छापूर्ति का ,
दोनों ही आधुनिक हैं , द्रोणाचार्य आजकल अंगूठा नहीं कैश इन हैंड मांगते हैं ……!! “
टीचर आज हर चौराहे पर सैकड़ो की संख्या में मिल जायेंगे ! पर एक गुरु का मिलना दुष्कर है, गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।
” गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर,
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: “
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं !
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ “
सबसे बड़ा तीर्थ तो गुरुदेव ही हैं जिनकी कृपा से फल अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरुदेव का निवास स्थान शिष्य के लिए तीर्थ स्थल है। उनका चरणामृत ही गंगा जल है। वह मोक्ष प्रदान करने वाला है। गुरु से इन सबका फल अनायास ही मिल जाता है। ऐसी गुरु की महिमा है । भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से ही गुरु को आदर-सम्मान देने की परंपरा रही है। गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना जाता है।





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