सोचिये उस देश के दुर्भाग्य के विषय में जहाँ गंगा-जमुनी तहजीब की लहरें हिलोरें मारती हो और देश का बच्चा-बच्चा श्रीराम के अस्तित्व की लड़ाई लड़ा हो और लड़ते-लड़ते मर गया हो, 5 हज़ार गो रक्षकों पर किसी सरकार ने गोली चलवाई हो। हाल ही में पुलिस द्वारा नागा साधुओं को दरिदों के हवाले कर दिया गया हो, यह सब उस देश में हुआ, जहाँ उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक रोम- रोम में राम बसते हों। वहाँ केवल मुसलमानों को खुश करने के लिए राम के अस्तिव पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जाए।
आज जब हमने इस बहुप्रतीक्षित अदालती युद्ध को जीता है तो कई स्वनाम धन्य गिरोह कलनेमि बन कर चारो तरफ से घेरने को तैयार हैं। कोई किये कराए पर मिट्टी डालने के लिए चांदी की डिबिया लिए खड़ा हो जाता है, कोई कहता है कि “दुनिया याद रखेगी लोग कोरोना से मर रहे थे तो यह सरकार मन्दिर बनवा रही थी”। फिर कोई उन से पूछे कि जब मन्दिर बनवाने का समय था तो वो राम के अस्तित्व पर ही क्यों प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे।
इस देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या को अपने अस्तिव का परिचय देना पड़ता है। एकमात्र कारण यहाँ कुछ तथाकथित सेक्युलर धंधे बाज लोग बसते हैं। वरना नालन्दा जाने के लिए बख्तियारपुर न उतरना पड़ता। इस देश के पहले प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री ने देश को अस्त-व्यस्त करने के बीज उस वक़्त ही बो दिये थे। आप मानिए या मत मानिए। वरना माथुर मन्दिर की दीवार से लगी मस्जिद, काशी विश्वनाथ के साथ मस्जिद क्यों खड़ी की जाती। पहली बार जब मथुरा मन्दिर के दीवार से लगी मस्जिद देखी, तो बड़ा विचित्र लगा क्योंकि सम्भवतः उतने सेक्युलर नहीं हुए हैं कि इस अतिक्रमण को आसानी से पचा पाते।
सब पंथों का सम्मान करना यह बात संविधान ने नहीं, मुझें या प्रत्येक भारतवासी को सनातन परम्परा पहले ही सीखा देती है। हमारा धर्म समस्त विश्व को कुटुंब मानता है यहाँ न कोई काफ़िर होता है,न जेहाद की जरूरत है,और न ही जबरदस्ती धर्मांतरण की। फिर भी 42वां संशोधन किया गया क्यों ? पूछिये राम-सीता की तस्वीर संविधान के पन्नों से कैसे और कहाँ गायब कर दी गई? गलती हमारी भी कम नहीं क्योंकि जब कोई हिन्दू ज़रूरत से ज्यादा लिख-पढ़ लेता है तो सबसे पहले वो अपना जनेऊ उतार देता है,हर परंपरा मान्यता उसके लिए ‘बुल-शीट’ हो जाती है,उसका परिधान बदल जाता है,परिचय बदल जाता है।
एक बार जो जड़ से कटा फिर उसे कहीं भी आसानी से उड़ाया जा सकता है यह अलग बात कि उसका अपना कोईं अस्तित्व नहीं रह जाता। खैर देर से ही सही मगर तन्द्रा तो टूटी है। सीधी सी एक बात किसी को भी बस उतना ही सम्मान दें, जिसके वो लायक हो। किसी भी धर्म का उतना ही सम्मान कीजिये जितना वो आपके धर्म का करता है। ज़रूरत से अधिक सम्मान मिल जाने पर दिमाग खराब होना निश्चित है।

इस लेख की लेखिका श्रीमती अलका सिंह जी हैं । यह लेख उनके फ़ेसबुक वॉल से साभार उनकी अनुमति से लिया गया है ।






