लखनऊ । बीते दिनों महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी जो पंच दशनाम जूना अखाड़ा के साधु थे। घटना में दो साधुओं सुशील गिरी महाराज (35) और चिकणे महाराज कल्पवृक्षगिरी (70) थे। ये तीनों कांदिवली से सूरत जा रहे थे। घटना के बाद इस अखाड़े के साधुओं में गहरा रोष है। उन्होंने इस मामले में सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है।
क्या है जूना अखाड़ा ?
आइये जानते हैं कि ये अखाड़े होते क्या हैं ? अखाड़े के दो मतलब हो सकते हैं- एक तो वो जगह, जहां पहलवान कुश्ती लड़ते हैं। दूसरा संन्यासियों का समूह। हिंदू धर्म मे संतों-महतों को कई अखाड़ों में बांटा गया है। माना जाता है कि इनकी स्थापना आदिगुरू शंकराचार्य ने की थी। उन्होंने बाहरी आक्रमणकारियों से धार्मिक लोगों को बचाने के लिए 7 अखाड़ों की स्थापना की। इनमें महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आह्वान, अग्नि और आनंद शामिल हैं। जूना अखाड़े के नाम के पीछे एक कथानक चरितार्थ है। आठवीं सदी में भैरव अखाड़े की शुरुआत हुई। इस अखाड़े के साधु शस्त्र धारण करते थे। इन्होंने कई मौकों पर युद्ध में लोगों की जान बचाने के लिए बलिदान भी दिया। हर अखाड़े के अपने इष्टदेव होते हैं। जूना अखाड़े के इष्टदेव भगवान दत्तात्रेय माने जाते हैं। इस वक़्त चार लाख से भी ज्यादा नागा साधुओं के साथ जूना अखाड़ा देश के सबसे बड़े अखाड़ों में से एक है।
कैसे बनते हैं अखाड़े के सदस्य ?
स्वामी आनंद गिरि ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति अखाड़े का सदस्य बनना चाहता है, तो पहले उसे 12 वर्षों का संकल्प पूरा करना पड़ता है। इन 12 सालों में रहकर वो अखाड़े के नियम सीखता है। परंपराओं को कैसे निभाना है, इसका ज्ञान लेता है। इन 12 सालों में उसे वस्त्रधारी ब्रह्मचारी कहा जाता है। जब इन 12 सालों का संकल्प पूरा हो जाता है, तभी वो व्यक्ति नागा साधु बन पाता है। कुंभ के मेले में फिर उसकी नागा साधु के रूप में दीक्षा होती है।

लाव-लश्कर के साथ निकलते हैं तो टिक जाती हैं निगाहें
आज़ादी के बाद अब कुंभ मेलों में ‘पेशवाई’ के समय ही अखाड़े अपने पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र दिखाने के लिए उतरते हैं। कुंभ की ‘पेशवाई’ में किसी भी अखाड़े के नागा साधु अपने पूरे समुदाय के साथ निकलते हैं। इसमें हाथी, घोड़े, पालकियां, और उनके हथियार होते हैं। गौरतलब है कि आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जूना अखाड़े के प्रमुख हैं। वह साल 1998 में इस पद पर नियुक्त हुए थे।






