प्यार करके इजहार करने से ज्यादा मुश्किल है उस प्यार को इज्जत देना और समाज में दिलवाना। जाहिर सी बात है ऐसे खूबसूरत इत्तेफाक कम ही होते हैं।
शोहरत की पतंग बनकर मिसाल की डोर से बंधी ऐसी ही खूबसूरत कहानी है, साहिर-अमृता-इमरोज की !
जीवन के रंगमंच पर बहुत कम ही ऐसे कलाकार हैं जो लैला, हीर, जूलियट और अमृता के किरदार को साकार कर पाते हैं। जिन लोगों के नाम यहां लिए गए उनकी मोहब्बत को उस दौर में कभी इज्जत नहीं मिली पर आज उनके इश्क के फसाने लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

साहिर-अमृता और इमरोज का प्यार जमाने से अलहदा था… इश्क की पहले से खिंची लकीरों से जुदा। अधूरी मोहब्बत का ये वो मुकम्मल अफसाना था, जिसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती।
आइये साहिर-अमृता-इमरोज के बहाने उस प्रेम को समझने की कोशिश करते हैं जो कीचड़ में कमल की तरह है। वो कमल जिसे ‘विश्व का गर्भ’ कहा जाता है क्योंकि यह मन की पवित्रता, इंसानी स्वभाव और आध्यात्मिक रोशनी का प्रतीक है।
इस कहानी के तीन किरदार हैं… पर केंद्र में हैं अमृता !
अमृता ने आजीवन साहिर से मोहब्बत की और इमरोज ने अमृता से… एक बार अमृता ने साहिर और इमरोज के साथ अपने रिश्ते को एक लाइन में समेटा था !
‘साहिर मेरा खुला आसमान है और इमरोज मेरे घर की छत, यह बात और है कि छत खुलती आसमान में है.’
मुशायरे में मिली नजर और शायरियों में इश्क !
यह प्रेम कहानी गुलाम भारत में शुरू हुई थी।
31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला ( अब पाकिस्तान) में अमृता का जन्म हुआ था। केवल 6 साल की उम्र में उनकी शादी व्यापारी प्रीतम सिंह से कर दी गई। हालांकि उनका गौना नहीं हुआ और वे अपने पिता के घर पर ही रहीं। अमृता को नज्म लिखने का शौक था। 16 साल की उम्र में उनकी पहली किताब ‘अमृत लहरें’ प्रकाशित हुई। इसके बाद प्रीतम उन्हें अपने साथ विदा कर ससुराल ले गए। उनकी उम्र और समझ में फासला था, सो शादीशुदा जीवन कुछ खास नहीं कट रहा था। अकेले में अमृता का नज्म लिखने का कारबां जोर पकड़ता चला गया और वो शायरियां लिखने लगीं।

इसके बाद साल 1944 को लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित प्रीत नगर में आयोजित एक मुशायरे में अमृता ने शिरकत की। यहीं उनकी मुलाकात तेजी से उभर रहे शायर साहिर लुधियानवी से हुई। कहा जाता है कि दोनों ने एक-दूसरे को पहली ही नजर में पसंद कर लिया था, पर आंखों से हुई बात जुबां पर नही आई।
अमृता ने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकिट’ में पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा है कि उस रात मुशायरा खत्म होते ही अचानक बारिश होने लगी। “पता नहीं ये उसके लफ्जों का जादू था या उसकी खामोश निगाह का, लेकिन मैं उससे बंधकर रह गई थी। आज जब उस रात को मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आता है कि तक़दीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया।”
इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि अमृता ससुराल में रहने के कारण कम ही घर से बाहर निकलती थीं। जब भी दोनों मिलते तो ज्यादा बातें नहीं करते थे। ऐसा लगता था जैसे खामोशी का ही एक हिस्सा अमृता की बगल वाली कुर्सी पर पसर गया है और फिर अचानक उठकर चला गया।
हैरानी की बात ये थी कि एक ऐसे समय में जब महिलाएं किसी के लिए अपनी मोहब्बत को छुपाए रखने में ही अपनी भलाई और इज़्ज़त समझती थीं, अमृता ने साहिर से अपनी मोहब्बत का खुलेआम इज़हार किया।

दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ती कि भारत-पाकिस्तान का जन्म हो गया। साहिर लाहौर में ही रह गए और अमृता पति के साथ दिल्ली चली आईं। हालांकि दो मोहब्बत करने वालों के बीच की इस दूरी को खतों ने दूर किया। जिस्म दूर थे मगर दिल करीब और रूह एक। सो, कागज पर इश्क उकेरा जाता रहा। कभी स्याह तो कभी सुर्ख। रौशनाई ने मोहब्बत में रंग भरे। प्यार के पैगामों का ये सिलसिला यूं ही लाहौर और दिल्ली के बीच जारी रहा।
साहिर नहीं जुटा पाए ‘हिम्मत’
दिल्ली में रहते हुए अमृता दो बच्चों की मां बन चुकी थीं, पर शादीशुदा जीवन अब भी अच्छा नहीं था। प्रीतम को उनका साहिर के प्रति झुकाव बर्दाश्त न हुआ। सो अमृता ने हिम्मत करके इस रिश्ते से बाहर निकल जाना ही सही समझा। दिल में भले ही साहिर थे पर उन्होंने अपने नाम से प्रीतम को सदा जोड़े रखा।
साहिर इस समय तक मुंबई आ चुके थे और फिल्मों में उनके गीत मशहूर हो रहे थे। अमृता जमाने के सामने अपने इश्क का एलान करने को तैयार थीं पर यह हिम्मत साहिर में नहीं थी।
साहिर के जानने वालों का मानना है कि उनकी जिंदगी में उनकी मां सरदार बेगम का बड़ा दखल रहा था। औरतों से उनके रिश्ते सरदार बेगम के असर के हिसाब से तय होते थे। सरदार बेगम ने अपने पति को छोड़कर अकेले ही साहिर को पाला था। साहिर ने देखा था कि उन्हें पालने के लिए मां ने कितनी दिक्कतें झेली, इसीलिए वह मां का बहुत सम्मान करते थे।
एक बार उन्होंने अमृता को अपनी मां से मिलवाया भी था मगर, साहिर कभी अमृता को पूरी तरह अपनाने के लिए जहनी तौर पर तैयार नहीं हो सके। उन्हें इस प्यार का मुकम्मल मुस्तकबिल (भविष्य) नजर नहीं आता था। वो अमृता के लिए जो प्यार महसूस करते थे, उसे वो अपनी कलम से तो जाहिर कर लेते थे पर सामाजिक तौर पर इस रिश्ते को पहचान दिला पाने की कभी जहमत नहीं उठाई।
हालांकि अमृता ने कभी साहिर से इस बारे में शिकायत नहीं की।
…और बहक गया दिल !
साहिर का मिजाज शायराना होने के साथ ही आशिकाना भी था। बेशक वे अमृता से प्यार करते थे पर जब उनकी मुलाकात बॉलीवुड में उभरती गायिका सुधा मल्होत्रा से हुई तो वे थोड़ा बहक गए। जहनी तौर पर वह अमृता के साथ रहे पर सुधा से भी रिश्ता कायम होने लगा।
ऐसे में समय के साथ अमृता अकेली पड़ गईं।
अमृता को साहिर के कारण सिगरेट पीने की लत लगी थी। हुआ यह कि अमृता से मुलाकात के दौरान साहिर लगातार सिगरेट पीते रहते थे। जब साहिर वहां से चले जाते, तो अमृता अपने दीवाने की सिगरेट के टुकड़ों को अपने लबों से लगाकर अपने होठों पर उनके होठों की छुअन महसूस करने की कोशिश करती थीं। यहीं से उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी, पर उन्होंने कभी सिगरेट का पैकेट नहीं खरीदा। हमेशा साहिर की छोड़ी गई सिगरेट ही पीती रहीं।
यह आग की बात है, तूने यह बात सुनाई है
सिगरेट को लेकर उनकी लिखी एक कविता…
यह जिंदगी की वही सिगरेट है,जो तूने कभी सुलगाई थी
चिंगारी तूने दी थी, यह दिल सदा जलता रहा
वक्त कलम पकड़ कर, कोई हिसाब लिखता रहा
जिंदगी का अब गम नहीं, इस आग को संभाल ले
तेरे हाथ की खेर मांगती हूं, अब और सिगरेट जला ले
चाय का वो जूठा कप…
साहिर की जीवनी, साहिर: अ पीपुल्स पोएट में लेखक अक्षय मानवानी ने एक किस्सा लिखा है। ‘एक बार संगीतकार जयदेव, साहिर के घर गए. दोनों किसी गाने पर काम कर रहे थे। तभी जयदेव की नजर एक गंदे कप पर पड़ी। उन्होंने साहिर से कहा कि ये कप कितना गंदा हो गया है, लाओ इसे साफ कर देता हूँ। तब साहिर ने उन्हें चेताया था, ‘उस कप को छूना भी मत. जब आखिरी बार अमृता यहां आई थी तो उसने इसी कप में चाय पी थी’.
साहिर और अमृता की मोहब्बत खूबसूरत अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। मगर ये इश्क एकदम अलहदा (जुदा) था, ये रिश्ता बेहद पाक (शुद्ध) था, जिसे खतों और खामोशी के जरिए दोनों ने बड़ी खूबसूरती से निभाया।
फिर इमरोज ने ‘बिखेरे रंग’
साहिर दूर हो चुके थे लेकिन अमृता की ज़िंदगी में अभी उनके हिस्से की मोहब्बत बाकी थी।
कहा जाता है कि लेखक खुशवंत सिंह ने एक बार हंसी ठिठोली में कहा था कि अमृता की जीवनी तो इतनी सी है कि एक डाक के टिकट पर लिखी जा सकती है। यहीं वजह थी कि जब अमृता ने अपनी जीवनी लिखी तो नाम रखा, ‘रसीदी टिकट’।
1958 में अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब ‘आख़िरी खत’ का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया।

कवर का रंग तो खूबसूरत था ही, उसे रंगने वाले का दिल उससे भी ज्यादा खूबसूरत था। सो अमृता और इमरोज की दोस्ती हो गई। इमरोज दिल्ली के साउथ पटेल नगर में और अमृता वेस्ट पटेल नगर में रहतीं थी, इसलिए अक्सर दोनों की मुलाकात हो जाती।
अमृता इमरोज के लिए ऐसे कोरे कैनवास की तरह थीं, जिस पर वे रंग भरने की कोशिश करते रहते पर साहिर का रंग हमेशा उस पर भारी रहता। यह बात और है कि इमरोज को कभी इससे शिकायत न हुई।
एक रोज इमरोज ने बातों बातों में अमृता से कहा कि मैं आज के दिन पैदा हुआ था। गांवों में लोग पैदा तो होते हैं लेकिन उनके जन्मदिन नहीं होते। वो एक मिनट के लिए उठीं, बाहर गईं और फिर आकर वापस बैठ गईं। थोड़ी देर में एक आदमी प्लेट में केक रखकर बाहर चला गया। उन्होंने केक काटकर एक टुकड़ा इमरोज को दिया और दूसरा खुद खा लिया। अब बात इतनी गहरी थी कि ना तो उन्होंने हैपी बर्थडे कहा ना ही इमरोज ने उनका शुक्रिया !

‘लिव इन’ में रहने वाली ‘पहली जोड़ी’
अमृता-इमरोज एक दूसरे के दिल के करीब थे, पर उन्होंने कभी जमाने के बाकी आशिकों की तरह अपने प्यार का इजहार नहीं किया। जब रोज-रोज मिलना ही था तो दोनों ने तय किया कि क्यों ना साथ ही रहा जाए ? उस दौर में ऐसी बातें बदचलनी की निशानी थीं, पर इस बात से न तो कभी अमृता को फर्क पड़ा न इमरोज को।
अमृता-इमरोज को आजाद भारत की वह पहली जोड़ी मानी जाती है जो लिव-इन में रहे। परंपरा ये है कि आदमी-औरत एक ही कमरे में रहते हैं। पर वे पहले ही दिन से अलग-अलग कमरों में रहे।

अमृता रात के समय लिखती थीं। जब ना कोई आवाज़ होती हो ना टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और ना कोई आता-जाता हो… तब इमरोज सो रहे होते थे।
और दिन में जब इमरोज कैनवास पर रंग-बिरंगी लकीरें उकेर रहे होते तो उन्हें घंटों तक खामोशी से देखती रहतीं। अमृता लिखने में मशगूल रहतीं तो इमरोज रात को एक बजे उठकर उनके लिए चाय बनाते, प्याला उनके आगे सरका आते और सो जाते। अमृता न तो प्याले को देखतीं न इमरोज को। यह सिलसिला आजीवन जारी रहा।
‘इमरोज़’ ने अपने और अमृता के इश्क में साहिर की हिस्सेदारी को लेकर कभी विलेन बनने की कोशिश नहीं की बल्कि वह तो अमृता के इस जज्बे को पूजते रहे।’
इमरोज़ और अमृता की नजदीकी पर दोस्त उमा त्रिलोक ने एक किताब भी लिखी है- ‘अमृता एंड इमरोज़- ए लव स्टोरी’ जिसमें लिखा है कि अमृता की हमेशा से एक आदत थी कि वो हर वक़्त कुछ न कुछ लिखती रहती थीं। उनकी उंगलियां बिना पेन के भी चलती रहती थीं।

एक बार जब इमरोज स्कूटर से अमृता को ले जा रहे थे तब अमृता, इमरोज़ की पीठ पर आदतन ऊंगलियों से कुछ लिख रही थीं। इमरोज़ ने कई बार महसूस किया जैसे अमृता ने उनकी पीठ पर लिखा हो ‘साहिर’! इस पर जब इमरोज़ कुछ न बोले तो अमृता ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें इस बात का बुरा नहीं लगा। तब इमरोज़ ने जवाब दिया कि, “साहिर भी तुम्हारे और मेरी पीठ भी फिर किस बात का बुरा मानुं। ”
जब छोड़ दी ‘नौकरी’
वर्ष 1958 में जब इमरोज़ को मुंबई में गुरुदत्त के यहां नौकरी मिली तो अमृता को दिल ही दिल अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि साहिर लुधियानवी की तरह इमरोज़ भी उनसे अलग हो जाएंगे। उनके जाने के तीन दिन पहले अमृता ने कहा कि यह मेरी जिंदगी के आखिरी 3 दिन हैं।
सो अमृता और इमरोज ने इन तीन दिनों में जी भर के जिंदगी जी। जहां मन किया वहां बैठे, बातें की, मनपसंद खाना खाया। तीन दिन बाद इमरोज चले गए और उनके जाते ही अमृता बीमार हो गईं।

इमरोज को जब यह पता लगा तो वे नौकरी छोड़कर अगले ही दिन दिल्ली वापिस आ गए। अमृता खुशी से उनका स्वागत करने के लिए दिल्ली स्टेशन पर पहुंची और इमरोज को देखते ही उनका बुखार उतर गया।
हमेशा साथ रहे इमरोज !
अमृता जहां भी जाती इमरोज़ को साथ लेकर जाती थीं। यहां तक कि जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तो इमरोज़ हर दिन उनके साथ संसद भवन जाते थे और बाहर बैठकर उनका इंतज़ार किया करते थे।
वो उनके साथी भी थे और उनके ड्राइवर भी !

अमृता नामचीन लेखिका बन चुकी थीं इसलिए उन्हें कई बड़ी जगहों से दावतों के आमंत्रण मिलते। जब लोगों को अमृता के ‘बॉयफ्रैंड’ के बारे में पता लगा तो कार्ड पर इमरोज का नाम भी लिखा जाने लगा। हालांकि संसद के गार्ड उन्हें हमेशा ड्राइवर ही समझते रहे।
अमृता का आख़िरी समय बहुत तकलीफ़ और दर्द में बीता। बाथरूम में गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई। ‘इमरोज़ ने अमृता की सेवा करने में अपने आपको पूरी तरह से झोंक दिया।

… और घूम ली सारी दुनिया !
इमरोज़ अमृता के जीवन में काफी देर से आए। अक्सर अमृता इस बात की शिकायत करती थीं। वो इमरोज़ से पूछतीं, ‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते’। जब इमरोज ने कहा कि वह अमृता के साथ रहना चाहते हैं तो उन्होंने कहा, पूरी दुनिया घूम आओ फिर भी तुम्हें लगे कि साथ रहना है तो मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करती मिलूंगी।

तब कमरे में सात चक्कर लगाने के बाद इमरोज़ ने कहा कि घूम ली दुनिया, मुझे अब भी तुम्हारे ही साथ रहना है। किसी भी वजह से दोनों के बीच कभी झगड़ा नहीं हुआ, क्योंकि इस रिश्ते में दोनों अपनी जगह आजाद थे।
31 अक्टूबर 2005 को अमृता ने आखिरी सांस ली। दुनिया को अलविदा कहने से पहले अमृता ने अपनी आखरी कविता लिखी, ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बनकर
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास के ऊपर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं





